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कैसे हुआ सिक्किम टनल हादसा? 21 साल से अधूरा प्रोजेक्ट, करोड़ की लागत और 8 मौतों ने खड़े किए बड़े सवाल

सिक्किम टनल हादसे ने 21 साल पुराने तीस्ता-VI प्रोजेक्ट पर सवाल खड़े किए। 8 मजदूरों की मौत के बाद 8,449 करोड़ लागत वाली परियोजना की सुरक्षा जांच शुरू हुई।

Reported by Shagun Chaurasia and edited by Shagun Chaurasia

Sikkim Tunnel Collapse: सिक्किम के नामची जिले में निर्माणाधीन टनल में हुए दर्दनाक हादसे ने एक बार फिर पहाड़ी इलाकों में चल रहे बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स की सुरक्षा और देरी पर सवाल खड़े कर दिए हैं। सोमवार को सामरदुंग-झोलुंगेय क्षेत्र में हुए हादसे में अब तक 8 मजदूरों की मौत हो चुकी है, जबकि 27 लोग टनल के अंदर फसे है। हादसे के बाद राहत और बचाव अभियान लगातार जारी है।

21 साल पहले हुई थी परियोजना की शुरुआत

यह टनल NHPC की 500 मेगावाट क्षमता वाली तीस्ता स्टेज-VI जलविद्युत परियोजना का हिस्सा है। हैरानी की बात यह है कि इस परियोजना की शुरुआत 21 साल पहले हुई थी, लेकिन आज भी यह पूरी तरह तैयार नहीं हो सकी है। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद परियोजना में देरी ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं।

Sikkim Namchi Tunnel History

कैसे हुआ सिक्किम टनल हादसा?

जानकारी के मुताबिक, हादसा सोमवार 20 जुलाई को दोपहर के समय हुआ। उस वक्त इलाके में लगातार बारिश हो रही थी। अचानक पहाड़ी से भारी मलबा और चट्टानें खिसककर टनल के प्रवेश द्वार पर आ गिरीं, जिससे रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। टनल के अंदर काम कर रहे मजदूर बाहर नहीं निकल पाए। हालात और गंभीर तब हो गए जब बचाव दल को अंदर जहरीली गैस होने की आशंका हुई। कुछ बचावकर्मियों को अंदर जाने के दौरान चक्कर आने और परेशानी जैसी स्थिति का सामना करना पड़ा।

बारिश, खराब मौसम, पहाड़ी इलाका और गैस का खतरा राहत कार्य में बड़ी चुनौती बन गया। NDRF, SDRF, पुलिस, दमकल विभाग और जिला प्रशासन की टीमें लगातार रेस्क्यू ऑपरेशन में जुटी हैं।

 आखिर अब तक अधूरी क्यों?

तीस्ता स्टेज-VI हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट की शुरुआत साल 2005 में हुई थी। उस समय इसका काम लैंको तीस्ता हाइड्रो पावर लिमिटेड को सौंपा गया था। शुरुआत में परियोजना को साल 2012 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया था, लेकिन कई कारणों से यह समय पर पूरा नहीं हो पाया। निर्माण में देरी के पीछे वित्तीय संकट, पर्यावरण और वन मंजूरी से जुड़े मुद्दे, पहाड़ी भूगर्भीय परिस्थितियां और कमजोर चट्टानें बड़ी वजह बनीं। साल 2011 में आए भूकंप का असर भी परियोजना पर पड़ा।

बाद में मूल कंपनी आर्थिक संकट में चली गई और साल 2018 में उसके खिलाफ दिवालिया प्रक्रिया शुरू हुई। इसके बाद केंद्र सरकार की मंजूरी के बाद मार्च 2019 में NHPC ने इस परियोजना को संभालने की जिम्मेदारी ली। जब NHPC ने प्रोजेक्ट अपने हाथ में लिया, तब तक करीब 30 प्रतिशत काम ही पूरा हुआ था। इसके बाद नए सिरे से निर्माण प्रक्रिया शुरू करनी पड़ी।

5,748 करोड़ से बढ़कर 8,449 करोड़ हुई लागत

जब परियोजना शुरू हुई थी, तब इसकी अनुमानित लागत करीब 5,748 करोड़ रुपये थी। लेकिन देरी, महंगाई, नए निर्माण कार्य और पहाड़ी क्षेत्र की चुनौतियों के कारण लागत लगातार बढ़ती गई। दिसंबर 2025 की रिपोर्ट के मुताबिक, इस परियोजना की लागत बढ़कर करीब 8,449 करोड़ रुपये तक पहुंच गई है। फिलहाल इसे सितंबर 2029 तक पूरा करने का लक्ष्य रखा गया है। हालांकि हिमालयी क्षेत्र में निर्माण की कठिन परिस्थितियों को देखते हुए समय सीमा में बदलाव की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

कैसी है यह जलविद्युत परियोजना?

तीस्ता स्टेज-VI एक रन-ऑफ-द-रिवर हाइड्रो प्रोजेक्ट है। इसमें नदी के बहाव का इस्तेमाल बिजली बनाने के लिए किया जाता है। इसमें बड़े जलाशय की जगह पानी को सुरंगों के माध्यम से भूमिगत पावर हाउस तक पहुंचाया जाता है। परियोजना में करीब 26.5 मीटर ऊंचा बैराज बनाया जा रहा है। इसके अलावा दो बड़ी हेड रेस टनल बनाई जा रही हैं, जिनकी लंबाई करीब 13.76 किलोमीटर और व्यास लगभग 9.8 मीटर है।

इन सुरंगों के जरिए पानी भूमिगत बिजलीघर तक पहुंचेगा, जहां चार यूनिट लगाई जानी हैं। हर यूनिट की क्षमता 125 मेगावाट होगी और कुल उत्पादन क्षमता 500 मेगावाट होगी।

पूरा होने के बाद क्या होगा फायदा?

परियोजना पूरी होने के बाद देश को अतिरिक्त स्वच्छ ऊर्जा मिलेगी। अनुमान के मुताबिक, यह प्रोजेक्ट सालाना करीब 2,400 मिलियन यूनिट बिजली पैदा कर सकता है। इससे पूर्वोत्तर क्षेत्र की ऊर्जा व्यवस्था मजबूत होगी। साथ ही सिक्किम को भी परियोजना से मुफ्त बिजली का हिस्सा मिलेगा। शुरुआती 15 वर्षों तक राज्य को उत्पादन का 12 प्रतिशत हिस्सा मिलने का प्रावधान है, जो बाद में बढ़ सकता है। इसके अलावा परियोजना से स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर भी पैदा होने की उम्मीद है।

सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल

सिक्किम हादसे ने निर्माणाधीन टनल परियोजनाओं की सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। हिमालयी क्षेत्रों में भूस्खलन, कमजोर चट्टानें, बारिश और भूमिगत गैस जैसी चुनौतियां हमेशा बनी रहती हैं। विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐसे प्रोजेक्ट्स में बेहतर वेंटिलेशन, आपातकालीन रास्ते, गैस मॉनिटरिंग सिस्टम, मजबूत संचार व्यवस्था और नियमित भूगर्भीय जांच बेहद जरूरी होती है। फिलहाल हादसे के वास्तविक कारणों का पता जांच के बाद ही चल पाएगा। लेकिन इस घटना ने साफ कर दिया है कि बड़े विकास प्रोजेक्ट्स में तेजी के साथ-साथ मजदूरों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता देना जरूरी है।

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